अनुप्रिया तिर्की
1993-2010 का नागपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री के लिए एक स्वर्णिम दौर की
तरह था. बिहार-झारखंड के हर घर में पवन, पंकज और मोनिका के गीतों के कैसेट
बजते थे. अपराजिता अवार्ड, (2008), 2015 में कला संस्कृति विभाग के सम्मान
से अलंकृत एक नायिका मोनिका मुंडू अपने आप में एक बड़ा उदाहरण है.
“हर मनुष्य में कला एक ईश्वरीय वरदान है, संगीत में वो शक्ति है जो
मिट्टी को उपजाऊ बना सकती, रोगी को रोग मुक्त और आकाश से पानी बरसा सकती
है”- नम्रता से पूर्ण ये वक्तव्य हैं संगीत को समर्पित, मृदुभाषी,
हंसमुख,शालीन व्यक्तित्व की धनी गायिका, अभिनेत्री और बेहतरीन वक्ता के रूप
में पहचाने हुए चेहरे मोनिका मुंडू के हैं.उम्र के 40 वसंत पार कर चुकी इस
नायिका का जीवन संघर्ष भरा रहा.
अपने माता पिता और रेडियो के गीतों की तरफ रुझान को अपने गुणों की
पहचान कराने का जरिया बताते हुए वे कहती हैं कि “ समय चक्र की तरह रफ्तार
में गुजर रहा है, जरूरत है गति के अनुरूप खुद को ढालने की. वर्ग पांच से ही
इन्होंने गुरु गणेश मिश्रा से संगीत की शिक्षा लेना प्रारंभ कर दी. हाई
स्कूल की पढ़ाई के दौरान इन्होंने अपने बड़े भाई संग ऑर्केस्ट्रा में गीत
गाते हुए शुरुआत की. 1993 में ‘आई फोलोरा’ इनका पहला एल्बम था. इसके गीतों
को सिलीगुड़ी के फिल्म में जगह दी गयी.
‘प्रीत’, ‘फोलोरा’, ‘नदिया किनारे’, ‘नायरी’ जैसी अनेक बेहतरीन
म्यूजिक एलबम उदाहरण हैं नागपुरी म्युजिक की दुनिया में, जिसके गीत आज भी
लोगों की जुबां पर है और सदाबहार गीतों की तरह पसंद की जाती. एक वर्ग आज भी
इंतजार में हैं कि शब्दों की मिठास पुनः वैसी मिले आज के गीतों में.
मुंडा, उरांव, संथाली, खोरठा, नागपुरी, हिंदी, बांग्ला समेत 12 भाषाओं में
150 से भी अधिक म्यूजिक एल्बम एवं फिल्मों में अपनी गायिकी का लोहा मनवा
चुकी यह शख्सियत एक मिसाल है.
‘झारखंड कर छैला’ पहली फिल्म थी जिसे सुजाता सिनेमा हॉल में प्रदर्शित
किया गया था. इसमें भी गीतों को मोनिका मुंडू ने आवाज दी और अपने अभिनय
प्रतिभा से रूबरु कराया, सुपरहिट फिल्म ‘एमएस धोनी’ में भी इन्होंने अभिनय
किया.
वर्तमान समय में ‘माटी के रंग’, ‘मोर गांव मोर देश’‘रुक्का विलेज’,
पाखी हेगड़े के साथ ‘इलाका किशोर गंज’ आदि छह-सात फिल्मों में वे अभिनय के
क्षेत्र में काम कर रही है. ‘जाखोन रात्रि नामे’ नामक फिल्म से इन्होंने
बांग्ला फिल्मों में नायिका के रूप में कदम रखा है, साथ ही कई सरकारी
योजनाओं के विज्ञापन में भी इन्होंने अपनी उम्दा एक्टिंग प्रतिभा की झलक
दिखायी है. बहुमुखी प्रतिभा की धनी मोनिका मुंडू एक विद्यालय में शिक्षिका
के रूप में भी कार्यरत हैं और सेवा दे रहीं हैं.
मोनिका के शब्दों में ‘‘नारी एक रानी मधुमक्खी है वो अपनी झुंड को साथ
लिए चलती है, अपनी सलामती का ख्याल रखती है क्योंकि वो जानती है कि वो कई
जिंदगियों की दाता है.”
नागपुरी गायिकी की बदलती खोती मिठास को लेकर वह चिंतित हैं. पद्मश्री
मुकुंद नायक, मधुबन कई सारे बड़े नाम हैं, जिनकी कलाकारी विदेशों में सराही
गयी, उस कला का स्थान ही अलग और अद्भुत माना गया. यह कला उस कलाकार के साथ
ही चली जायेगी, यदि कोई अगला भी यदि इनमें पारंगत नहीं होता है. इन
महानुभावों से प्रेरित होकर या शिक्षा प्राप्त करें तो कला उनलोगों के रूप
में बची रहेगी. सरकार को चाहिए कि कला संस्कृति संस्था या सेंटरों की
संख्या बढाये, जिससे बुजुर्ग होती प्रतिभा को सहारा मिले, रोजगार मिले.
झारखंड के दूरस्थ गांव, जंगलों में कितनी ही प्रतिभा बसती है, संभव
नहीं कि हर कोई खेलगांव आ कर ही प्लेटफार्म तलाशे. राग-रागिनियों, धुनों की
संपन्नता से आने वाली पीढ़ी बिल्कुल भी अबोध रहेगी, क्यूंकि हालात आज ऐसे
हैं कि झारखंड की फिल्मों, गीतों, संस्कृति के लिए प्रतिभा समर्पित करने
वाले आज अपने घर में भूखे हैं, कई स्टूडियो की हालत खस्ता चल रही.
लेकिन हम उम्मीद लगाये बैठे हैं कि कोई बाहरी पूंजीपति हालत सुधारने
के लिए पैसा लगाएगा. पुराने अनुभवी लोग अगर अपनी जिम्मेदारी समझें और उन्हे
उचित सपोर्ट मिले तो हालात क्यूं नहीं सुधरेंगे, वरना वर्तमान की जो
स्थिति है कि यदि किसी पांच साल के बच्चे को नागपुरी गीत गा कर सुनाने को
कहा जाय और वह गाता है - “दारू वाली.. दारू पिला....”, “ एक बोतल पिलो...
की दोई बोतल... हड़िया...” ये हालत और बदतर होंगे, गीतों के बोल में
छिछलापन संस्कृति में घुन लगने के शुरुआती लक्षण हैं, क्योंकि उस पांच साल
के बच्चे को बोध नहीं कि वह क्या गा रहा, लेकिन आंख खोल कर देखने की जरूरत
है कि हमारे राज्य की छवि ऐसी क्यों बन रही है, जिसमें कोई संस्कार नहीं.
क्या संस्कृति का अस्तित्व, उसके मूल को बचाने का जिम्मा सिर्फ मुट्ठी
भर कलाकारों ने ले रखा है? क्या एक साफ-सुथरा परिवेश, समाज गढ़ने के लिए
हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं, और यदि है तो सिर्फ आज के गीतों को नापसंद करने
गालियां देने से तो बदलाव नहीं आएगा.
दशहरा जैसे त्योहार में कई कई करोड़ के सैकड़ों पंडाल लगाने में पैसा
लगाया जाता है, उनकी संख्या कम की जा सकती है, जिससे अास्था और प्रेम
बढ़ेगा ही और फिर उन पैसों का इस्तेमाल कला बचाने के लिए अच्छे गीतों के
निर्माण में लगाया जाना चाहिए. इससे कलाकारों और निर्माताओं की बेरोजगारी
तो ख़त्म होगी ही झारखंड की पहचान जो बहुत हद तक गीत संगीत फिल्मों से
उजागर होती है उसमें भी मजबूती आएगी.
अाधुनिकीकरण जरूरी है, लेकिन मूल जायके को हाशिये पर रख कर नहीं.
क्योंकि युवा पीढ़ी सिर्फ नाच नहीं रही है ताल पर, क्या शब्द परोसे जा रहे
हैं, उसे परवाह भी है. तकलीफ होती है जब उसकी बहन उसकी दोस्त का नाम यूं
गानों के बोल में बिल्कुल सस्ते समान की तरह इस्तेमाल कर दिया जाता है,
समाज का एक हिस्सा यह भी है, जहां लोगों ने हमेशा से इन गीतों में अपने
इमोशंस को जुड़ा पाया है, दर्द में सहभागिता का अनुभव किया है. उनके लिए
क्या सोचा जा रहा?
जब एक कलाकार राज्य के संस्कृति की प्रस्तुति बाहर देता है वो पूरे
राज्य की छवि दिखाता है अतः शब्दों के चयन में एहतियात बरतने की जरूरत है.
अच्छे शब्दों के निर्माता की जरूरत है क्योंकि.....
“चाहे वो नागपुरी गीतों के लिए जलती लौ हो या
जले लौ किसी अन्य प्रतिभा की,
आंच भले धीमी रहे उसमें,
पर जलती रहे सदैव ही!!”
मोनिका मुंडू की चिंता को चरितार्थ करते ये शब्द झारखंडी संगीत के
अस्तित्व को जिंदा रखने के लिए जरूरी तथ्यों की ओर इशारा करते हैं. उम्मीद
है कि जो इतिहास रचा था मोनिका जी के योगदान ने इस इंडस्ट्री में, उसको
संभाले रखने की दिशा में काम किया जाएगा.
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